Thursday, February 13, 2020
जनसंख्या और क्षेत्रफल दोनों के हिसाब से चीन दुनिया का सबसे बड़ा देश था 17वीं सदी में चीन में मांग क्यों वंश का शासन आया मांजू शासनकाल में चीन के साम्राज्य की सीमाओं में लगातार विस्तार हुआ और वर्तमान चीन के अलावा मंगोलिया तिब्बत इत्यादि इस राज्य के हिस्से बने इसके अलावा चीन के शासकों का प्रभाव क्षेत्र कोरिया वियतनाम आदि देशों तक फैला हुआ था यह सभी राज्य चीन के सम्राट को नजराना भेंट करते थे।
मानती साम्राज्य मुख्यतः एक व्यवस्थित नौकरशाही के द्वारा संचालित था इसमें नियुक्ति परीक्षा के माध्यम से होती कि कोई भी इस परीक्षा में शामिल होकर कामयाब हो सकता था क्योंकि इसकी तैयारी काफी कठिन थी उसमें केवल संपन्न नकुल के लोग ही भाग ले पाते थे।
चीन का सामान मुख्यतः एक ही थी हर शाम आज था ज्यादातर आबादी अपनी आजीविका के लिए खेती पर ही निर्भर थी राज्य की आय का मुख्य साधन खेती पर लगाया गया लगान था लगान की वसूली के लिए अधिकारियों का एक विशाल समूह तैनात था।
कृषि के अतिरिक्त चीन में खनन एवं विनिर्माण उद्योग भी विकसित था चीन में नमक चांदी की और लोहे की विस्तृत खाने थी जहां पर चीन के खुद के उपयोग लायक खनिज उसका प्राप्त हो सकता था चीनी मिट्टी के बर्तन और रेशम के कपड़ों के लिए चीन हमेशा से ही प्रसिद्ध रहा था।
पूरी दुनिया से व्यापारी किन-किन वस्तुओं को खरीद के लिए आते थे चीन में अवश्य दी के रूप में पाए जाने वाला एक पेय पदार्थ चाय 18 वीं सदी में यूरोप में बहुत लोकप्रिय हुआ इसके बाद चाय के व्यापार के लिए भी चीन में यूरोपीय व्यापारी आने लगे संक्षेप में अगर कहे तो चीन अपनी जरूरत की सारी वस्तु की पूर्ति खुद से ही कर लेता था यहां एक तरह से आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था थी।
चीन के शासक चीन के बाहरी देशों के किसी भी तरह से प्रभाव से मुक्त रखना चाहते थे इसलिए उन्होंने विदेशी व्यापार पर कड़ा नियंत्रण स्थापित कर रखा था विदेशों के साथ व्यापार करने के लिए चीन बंदरगाह अधिकृत कर रखे थे कैंटन मकाउ और निगम व यूरोपीय व्यापारी चीन में इन्हीं बंदरगाहों तक जा सकते थे यहां से चीन के स्थानीय व्यापारी समूह विदेशी माल को पूरे चीन में ले जाते थे और चीन की जो वस्तुएं उन्हें चाहिए होती थी उसे विदेशी व्यापारियों को देते थे इन्हीं बंदरगाहों में यूरोपीय बस्तियां थी।
अंग्रेजी व्यापार और अफीम युद्ध
यूरोपीय व्यापारी लगातार यह कोशिश कर रहे थे कि उन्हें चीन से व्यापार करने का मौका मिले जिनके साथ व्यापार करने में भी सबसे पहले डच कंपनी को सफलता मिली अंग्रेजों ने जब चीज में व्यापार करना शुरू किया तो वे चाहते थे कि उन्हें कुछ भी आ जाते मिले लेकिन सन 1830 तक यहां संभव नहीं हो सका।
चीन के साथ यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उनसे चीन में भेजने के लिए कुछ नहीं था फलता है यूरोपीय व्यापारियों को अपने देश से सोना चांदी चीन में लाना पड़ा था।
इस तरह व्यापार संतुलन हमेशा चीन के पक्ष में रहता था इस बीच अंग्रेजों का शासन भारत पर बना अंग्रेज भारत से अफीम खरीदकर चीन में बेचने लगे इस से मिले धन से भी चीन से चाय रेशम आदि खरीदने लगे इस प्रकार उन्हें भुगतान के लिए इंग्लैंड से सोना चांदी लाने की जरूरत नहीं रही उन्होंने कोशिश की कि चीन से ज्यादा से ज्यादा अफीम बीके ताकि उन्हें अधिक लाभ हो।
चीन में अफीम का व्यापार अवैध था मूल्य तहत तस्करी के द्वारा होता था कैंटन बंदरगाह से यह अफीम भ्रष्ट चीनी अफसरों व व्यापारियों के द्वारा चीन के अन्य हिस्सों में पहुंचाया जाता था अफीम के इस व्यापार और अंदरूनी इलाकों तक इसकी सप्लाई का कुछ ही सालों में यहां असर हुआ कि बहुत बड़ी संख्या में चीन के लोग अफीम की लत के शिकार हो गए।
जब चीनी शासन को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने अंग्रेजों के व्यापारिक अध्याय को समाप्त कर दिए और कैंटन से उन्हें निष्कासित करने का आदेश दिया इसके कारण सन 1839 से 42 में चीन और अंग्रेजो के बीच युद्ध हुआ जिसे प्रथम अफीम युद्ध कहते हैं इस युद्ध में चीन की पराजय हुई सन 1842 में उसे एक अपमानजनक संधि करने पर विवश होना पड़ा इस संधि को नाम की संधि कहते हैं इस संधि के अनुसार अंग्रेजों को पूरे चीन में बिना किसी रूकावट के व्यापार का अधिकार मिला दूसरा अंग्रेजों को चीनी भूमि पर अपना व्यापारिक बच्चे आने की अनुमति मिली जिसमें अंग्रेजों का अपना कानून चल सकता था।
इसके अलावा चीन ने ब्रिटेन को एक बहुत बड़ी राष्ट्रीय हर्जाने के रूप में दी इस संधि में एक और सख्त यह जोड़ी गई कि अगर चीन किसी दूसरी यूरोपीय कंपनी को किसी भी तरह की बारिश की छूट देगा तो वह सोता ही अंग्रेजों को भी मिल जाएगी।
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