Monday, February 17, 2020

अफ्रीका का उपनिवेशी करण का इतिहास


हमने अमेरिका में अफ्रीकी देशों को बसाई जाने के बारे में पहले ऊपर पढ़ लिया है यूरोपीय देशों द्वारा अफ्रीका के उपनिवेश ई करण की शुरुआत सन 19 वीं सदी के मध्य में हुई 1878 तक अफ्रीका की केवल 10% जमीन पर यूरोपीय देशों का कब्जा था लेकिन महज 36 वर्षों में 1914 तक लगभग सारा महावीर किसी न किसी यूरोपीय देश का उपनिवेश बन गया।

दास व्यापार

उन्नीसवीं सदी के मध्य तक अफ्रीका में ज्यादातर हिस्से कली लाई समूहों से आवा था जीवन यापन के लिए मुख्य साधन पशुपालन कृषि जंगल से इकट्ठे किए गए कंदमूल एवं शिकार होते थे मध्य काल में भारत पश्चिमी एशिया और यूरोप में भी अफ्रीका महाद्वीप देशों की आपूर्ति के मुख्य स्त्रोत के रूप में जाना जाता था।

कबीलाई समूह के आपसी झगड़े में जो लोग युद्ध बंदियों के रूप में पकड़े जाते थे उनको दास के रूप में भेज दिया जाता था सन 1500 के बाद उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में खेती करने के लिए जैसे जैसे मजदूरों की जरूरत पड़ी वैसे वैसे अफ्रीका महाद्वीप से ताशों का व्यापार भी बढ़ता चला गया।

कई यूरोपीय देश इस अति लाभदायक मानव व्यापार में लग गए और करोड़ों अफ्रीकी यों को बेचकर खूब मुनाफा कमाया 450 साल से अधिक चले इस व्यापार को सन 1800 और सन 1900 के बीच धीरे-धीरे बंद किया गया।

मजेदार बात यह है कि अब यूरोपीय देश या कहने लगे कि अफ्रीका में दास व्यापार को खत्म करने के लिए उन्हें अफ्रीका पर अपना राज्य बनाने की जरूरत है उनमें अब होल्ड लग गई कि कौन अफ्रीका में सबसे अधिक जमीन पर कब्जा कर पाता है।

औद्योगिक क्रांति साम्राज्यवादी होड और अफ्रीका

ब्रिटेन जैसे प्रारंभिक देश ने अपने उद्योगों के लिए कच्चे माल एवं बाजार की तलाश में दुनिया के बड़े हिस्से पर खासकर एशियाई देशों पर कब्जा कर लिया था जर्मनी फ्रांस और इटली में औद्योगिक क्रांति लगभग 100 साल बाद हुई।

इन नव उद्योग देशों के लिए अफ्रीका ही एक ऐसा क्षेत्र था जिस पर कब्जा करने की संभावना थी।

वर्चस्व वादी विचारधारा 

यूरोप में इस समय कुल ऐसे विचार लोकप्रिय हो रहे थे जो यूरोपीय देशों को ज्यादा से ज्यादा उपनिवेश बनाने के लिए प्रेरित कर रहे थे उपनिवेश बनाना राष्ट्रीय शक्ति का पर्याय समझा जाता था और उपनिवेश के प्रसार के लिए काम करना राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति मानी जाती थी।

यूरोप में बहुत से लोगों का मानना था कि विश्व में मनुष्यों की कई नस्लें होती है और यूरोपीय नस्ल बाकी दुनिया की नस्लों से बेहतर है।

यह मानना कि मनुष्य की नस्लें होती है और एक नस्ल को दूसरी नस्ल से बेहतर माना नस्लवाद का जाता है नस्लवादी यह भी मानते हैं कि श्रेष्ठ नस्ल के लोगों का कमजोर नसों पर राज करना या उनका शोषण करना जरूरी और स्वाभाविक है।

अफ्रीका के दक्षिणी इलाकों में जैसे-जैसे दक्षिण अफ्रीका जिंबाब्वे आदि में कई यूरोपीय लोग जाकर बसें यहां तक कि भारत से भी बहुत से लोग वहां जाकर बसें।

वे सब अपने आप को स्थानीय श्वेत लोगों से श्रेष्ठ समझते थे और उन्हें कई बार विशेषाधिकार प्राप्त थे वह जहां प्रयास करते रहे कि विभिन्न मूल के लोगों का आपस में मेल मिलाप ना हो और नस्ला आधारित विशेषाधिकार बने रहें इससे रंगभेद की नीति बनी जो सन 1994 तक चली।

औपनिवेशिक काल में एक और विचार गोरे लोगों का भुजा बहुत लोकप्रिय हुआ था इस विचार के अनुसार दूसरे महाद्वीप के लोग पिछड़े हुए हैं इसलिए यूरोप के लोगों का नैतिक दायित्व है कि उन लोगों को सभ्य बनाया जाए।

इस विचार के अनुसार यूरोपीय देशों का यह कर्तव्य है कि विशेष संसार के देशों को ज्ञान और धर्म के मुद्दों पर पथ प्रदर्शित करें इस विचार को उत्साहित होकर बहुत से लोग अफ्रीका में इस आई या फिर आधुनिक विज्ञान वह तार्किक सोच के प्रचार-प्रसार में भी लग गए।

फरान जैसे कई यूरोपीय देश अपने उपनिवेश ओं में अफ्रीकी लोगों का एक ऐसा समूह तैयार करना चाहते थे जो यूरोपीय भाषा और संस्कृति धर्म और विचारों को अपनाने और औपनिवेशिक शासन की मदद करें इस उद्देश्य से अफ्रीका में कई यूरोपीय विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थान खोले गए।

Post a Comment

Whatsapp Button works on Mobile Device only

Start typing and press Enter to search