Tuesday, February 11, 2020

बर्लिन कॉन्फ्रेंस और अफ्रीका का बंटवारा सन 1884 से 1885 का इतिहास


सन 1850 के बाद यूरोप के 9 उद्योग इक्रित देशों ने अफ्रीका में आक्रमक तरीके से काम करना शुरू किया जल्दी ही यूरोप के कई देशों ने अफ्रीका के अलग-अलग हिस्सों पर कब्जा करने में सफल हो गए लेकिन इससे यह आशंका होने लगी कि यूरोप के देश आपस में ही लड़ने लगे आपसी युद्ध के खतरे को टालने के लिए यूरोपीय देशों ने अफ्रीका को आपस में बांटने का फैसला किया जर्मनी की राजधानी बर्लिन में एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें यूरोप के कुल 14 देशों ने भाग लिया सम्मेलन की सबसे मजेदार बात यह थी कि इस सम्मेलन में अफ्रीका के लोगों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किसी अफ्रीकी को नहीं बुलाया गया।

सम्मेलन में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया कि अफ्रीका के किसी भी हिस्से पर कोई भी यूरोपीय देश बाकी देशों की तरह कब्जा कर सकता है इस तरह से मात्र 30 सालों में ही पूरा अफ्रीका किसी न किसी यूरोपीय देश के प्रभाव क्षेत्र में आ गया हर एक यूरोपीय देश विभाग का अपने फायदे के लिए ज्यादा से ज्यादा दोहन करना चाहता था।

उपनिवेशवाद एवं उसका प्रभाव 

एक बार जब यूरोपीय देशों का अफ्रिका पर कब्जा हो गया तो उन्होंने इस भू-भाग को अपने हितों के अनुसार बदलना शुरू कियाइन बदलावों ने पूरे अफ्रीका में रहने वाले समुदायों के जीवन पर निर्णायक ढंग से असर किया।

पशुपालक समाज एवं उपनिवेशवाद

औपनिवेशिक शासन से पहले विशाल घास में गानों पर मसाई जनजाति के लोग मुख्यतः पशुपालन करते थे अफ्रीका के औपनिवेशिक करण की प्रक्रिया में ब्रिटेन और जर्मनी ने एक अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा बनाकर मसाई प्रदेश के दो टुकड़े कर दिए।

इसके पश्चात दोनों ही देशों ने इन घास के मैदानों पर खेती को प्रोत्साहित करना शुरू किया जिसे लगभग 60% चारागाह मसाई अपने पशुओं को चराने के लिए नहीं जा सकते थे।

मसाई समुदाय धीरे-धीरे उन इलाकों तक सिमट गए जहां न तो अच्छा चेहरा मिलता था और ना ही वर्षा होती थी पहले पशुपालन के द्वारा मसाई लोग किसानों से ज्यादा सुखी संपन्न होते थे बदलती परिस्थिति में उनकी हालत ज्यादा खराब हो गई अफ्रीका के अन्य हिस्सों में भी पशुपालक समुदाय इसी तरह की स्थितियों का सामना कर रहे थे।

खनिज क्रांति एवं अफ्रीका

सन 1867मैं वर्तमान दक्षिण अफ्रीका में हीरे की पहली खान मिली और सन 1886 में सोने की खानों का पता चला पता चलते ही हजारों गोरे लोग अपनी तकदीर आजमाने इस इलाके में आकर बसने लगे कीड़े का पता चलते ही इस भूभाग में सदियों से रहने वाले आदिवासियों एवं पहले से रह रहे और समुदाय की जमीन पर ब्रिटिश शासन ने कब्जा कर लिया और अफ्रीका में रहने वाले डच किसानों को कहा जाता है जो 17 वी सदी में यहां बसे थे।

हीरे की खान से हीरा निकालने के कार्य में बहुत से मजदूरों की आवश्यकता थी उस समय तक अफ्रीका में रहने वाले आदिवासी मजदूरी जैसी व्यवस्था में नहीं मिले थे और मुख्य था खेतिया पशुपालन के जरिए अपना भरण-पोषण करते थे इन आदिवासियों को मजदूर के रूप में काम करने हेतु विवश करने के लिए औपनिवेशिक शासन ने उन पर गृह कर लगाया इस कर के लिए पैसा कमाने के लिए एक वयस्क को 3 महीने मजदूर को काम करना पड़ता था फतेह स्थानीय आबादी की एक बहुत बड़ी संख्या अपनी खेती छोड़ इन खानों में काम करने लगी।

अब हीरे और सोने की खानों के आसपास मजदूरों की एक बड़ी संख्या निवास करने लगी इन मजदूरों के अलावा एक बड़ी संख्या में यूरोपीय आबादी भी रहती थी जो मुख्यतः इन खानों के प्रबंधन और विक्रय संबंधी कार्यों में लगी रहती थी इन सब के कारण दक्षिण अफ्रीका में नगरों का विकास हुआ सोने की खानों के साथ विकसित हुआ एक ऐसा ही नगर जोहानेसबर्ग है जो आज भी दक्षिण अफ्रीका का सबसे बड़ा शहर है इन शहरों में यूरोपीय आबादी और अफ्रीकी आबादी के लिए बसाहट बनाई गई और विभिन्न नियम बनाए गए अफ्रीकी लोगों के साथ भेदभाव करने रंगभेद नीति में इन नगरों की अलग-अलग व्यवस्था भी योगदान माना जाता है।

Post a Comment

Whatsapp Button works on Mobile Device only

Start typing and press Enter to search