प्रथम विश्वयुद्ध का इतिहास
सन 1914 में यूरोप में एक ऐसा युद्ध आरंभ हुआ जिसने पूरे विश्व को अपने प्रभाव क्षेत्र में समेट लिया इस युद्ध से जितना विनाश हुआ उतना मानव इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था सन 1914 में आराम होने वाला युद्ध एक सर्वव्यापी युद्ध था जिसमें युद्ध देशों ने अपने सारे संसाधन झोंक दिए इसका पूरी दुनिया का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ा इस युद्ध में असैनिक क्षेत्रों पर हुई बमबारी ओं से हुई तबाही अकाल और महामारी ओं से जितने आम लोगों की जानें गई उनकी संख्या युद्ध में मारे गए सैनिकों से कहीं अधिक थी इस अभूतपूर्व युद्ध ने दुनिया के इतिहास को एक नया मोड़ दिया।इस युद्ध की लड़ाइयां यूरोप और एशिया अफ्रीका और प्रशांत क्षेत्र में लड़ी गई थी इसके वृहद फैलाव और इसकी सर्वांगी प्रकृति के कारण इसे विश्वयुद्ध कहा जाता है अति व्यापक दीर्घकालिक दुष्परिणाम देने वाले महायुद्ध को विश्व इतिहास में दो बार लड़े जा चुके हैं जिन्हें क्रमशः प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध कहते हैं।
प्रथम विश्व युद्ध के कारण
१.साम्राज्यवादी शक्तियों में आपसी कलह
युद्ध का मूल कारण थी साम्राज्यवादी देशों की आपसी प्रतिस्पर्धा और टकराव एशिया अफ्रीका के क्षेत्रों पर अधिकार करने के लिए यूरोप के साम्राज्यवादी देशों में टकराव होते रहते थे कभी कभी साम्राज्यवादी देश आपस में शांतिपूर्वक निपटारा कर लेते थे और एक-दूसरे के खिलाफ बल प्रयोग के बिना एशिया अफ्रीका के विभिन्न भागों को आपस में बांट लेते थे कई बार आपसी टकराव के कारण युद्ध की परिस्थितियां भी पैदा हो जाती थी।
19 वी सदी के अंत तक स्थिति बदल चुकी थी एशिया और अफ्रीका के अधिकांश भागों को साम्राज्यवादी देश आपस में बांट चुके थे और आगे विजय का एक ही रास्ता था कि किसी साम्राज्यवादी देश से उसके उपनिवेश जीने जाएं इसलिए उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक के बाद के दौर में साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा के कारण विश्व को पुनर विभाजित करने का प्रयास होने लगा जिसे युद्ध की परिस्थितियां पैदा हुई।
२. उननिवेशों के लिए संघर्ष
जर्मनी के एकीकरण के बाद उसका बहुत अधिक आर्थिक विकास हुआ 1914 के आते-आते वह लोहे और इस्पात तथा बहुत से औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन में ब्रिटेन और फ्रांस को बहुत पीछे छोड़ चुका था।
जर्मनी उपनिवेश ओं की दौड़ में बहुत बाद में शामिल हुआ था इसलिए उसे कम उपनिवेश हाथ लगे थे जर्मन साम्राज्य वादियों ने पूर्व में पांव फैलाने की सूची उसकी महत्वाकांक्षी थीपतनशील उस्मानिया साम्राज्य की अर्थव्यवस्था पर अपना नियंत्रण स्थापित करना।
इसके लिए उसने बर लिंग से बगदाद तक एक रेल लाइन बिछाने की योजना बनाई इस योजना से ब्रिटेन फ्रांस और रूस डर गए क्योंकि इस रेल लाइन के तैयार होने पर उस्मानिया साम्राज्य से संबंधित उनकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं को धक्का लगता
जर्मनी की तरह यूरोप की सभी प्रमुख शक्तियां और जापान की भी अपनी अपनी साम्राज्यवादी महत्व का उठाएं थी इटली जो एकीकरण के बाद फ्रांस जितना ही शक्तिशाली बन चुका था उत्तरी अफ्रीका स्थित त्रिपोली पर नजरें गड़ाए था जो मुसलमान या साम्राज्य का क्षेत्र था।
फ्रांस अफ्रीका के अपने साम्राज्य में मोरक्को को भी शामिल करना चाहता था रूस की ईरान कुस्तुनतुनिया समेत उस्मानिया साम्राज्य के इलाकों सुदूर पूर्व और अन्य जगहों से संबंधित अपनी महत्वाकांक्षाओं थी रूस की महत्वाकांक्षाओं का ब्रिटेन जर्मनी और ऑस्ट्रिया के हितों और महत्वाकांक्षाओं से टकराव हो गया रहा था।
जापान भी तब तक एक समाजवादी देश बन चुका था सुदूर पूर्व में उसकी अपनी महत्वाकांक्षाओं थी और वह इन्हें पूरा करने के लिए भी कदम उठा चुका था ब्रिटेन के साथ साथ एक समझौता करने के बाद उसने सन 1904 से 1905 में रूस को हराया जिससे सुदूर पूर्व में उसका प्रभाव बढ़ गया।
ब्रिटेन का दूसरे से सभी साम्राज्यवादी देशों से टकराव हो रहा था क्योंकि उसके पास पहले से ही एक बहुत बड़ा साम्राज्य था और उसकी रक्षा करना आवश्यक था जब कभी किसी देश की सख्ती बरती थी उसे ब्रिटिश साम्राज्य के लिए खतरा समझा जाता था।
ब्रिटेन का अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी बहुत फैला हुआ था इस व्यापार की रक्षा उसे प्रतियोगी देशों से करनी पड़ती थी साथ ही अपने साम्राज्य के व्यापार मार्गों की रक्षा करें भी करनी पड़ती थी उस्मानिया साम्राज्य के बारे में ऑस्ट्रिया की महत्वाकांक्षाओं की संयुक्त राज्य अमेरिका भी 19 वीं सदी के अंत तक एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभर चुका था ।
३.यूरोप में संघर्ष
यूरोप की प्रमुख शक्तियों के बीच उपनिवेश और व्यापार को लेकर टकराव तो थे ही साथ ही यूरोप के अंदर होने वाली कुछ घटनाओं को लेकर टकराव थे उस समय यूरोप में छह प्रमुख शक्तियां थी ब्रिटेन जर्मनी ऑस्ट्रिया हंगरी रूस फ्रांस और इटली एक प्रश्न जिसमें यह सभी देश उलझ गए वह था यूरोप के बाल्कन प्रायद्वीप के देशों का प्रश्न बाल्कन प्रायद्वीप के देश उस्मानी साम्राज्य के अधीन थे मगर 19वीं सदी में उस्मानी साम्राज्य का पतन आरंभ हो चुका था।स्वाधीनता के लिए अनेक जातियां इस साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह कर रही थी रूस के जोड़ों को आशा थी कि इन क्षेत्रों से उस्मानी तुर्की का शासन समाप्त होने के बाद यह रूस नियंत्रण में आएंगे।
उन्होंने सर्वस लाओ नामक एक आंदोलन को बढ़ावा दिया जो किस सिद्धांत पर आधारित था कि पूर्वी यूरोप के सभी चलाओ एक जन्म के लोग हैं इस्लाम ऑस्ट्रिया हंगरी के अनेक क्षेत्रों में भी रहते थे इसलिए रूस ने उस्मानिया साम्राज्य और ऑस्ट्रिया हंगरी दोनों के खिलाफ आंदोलन को बढ़ावा दिया।
४. गुटों का निर्माण
यूरोप में उपनिवेश ओं को लेकर होने वाले दिन टकराव का वर्णन किया जा चुका है उनके कारण उन्नीसवीं सदी के अंतिम दर्शक और उसके बाद के काल में यूरोप में तनाव की स्थिति पैदा हो गई यूरोप के देश अब परस्पर विरोधी गुटों में शामिल होने लगे अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाने अपनी सेनाओं और नौसेना की संख्या बढ़ाने और पहले से अधिक घातक हथियार विकसित करने तथा आमतौर पर युद्ध की तैयारी करने पर व्यापार धन खर्च करने लगे बीसवीं सदी के पहले दशक में इन देशों के दो परस्पर विरोधी गुट बन गए अरे आपने अपनी सैनिक शक्ति के साथ एक दूसरे का मुकाबला करने के लिए तैयार हो गए किन देशों ने मिलकर 1882 में एक त्रिगुट बना लिया था जिसमें जर्मनी और इटली शामिल थे।मगर इस गुट के प्रति इटली की वफादारी संदिग्ध की क्योंकि उस का मुख्य उद्देश्य यूरोप में ऑस्ट्रिया हंगरी से कुछ इलाके चिन्ना और फ्रांस की सहायता से त्रिपोली को जीतना था इसी गुट के विरोध में फ्रांस रूस और ब्रिटेन नेशन हारना सब साथ में एक त्रिदेसीय संधि की।
युद्ध में ठीक पहले के वर्षों में एक के बाद एक संकट आए इन संकटों के कारण यूरोप में तनाव और कड़वाहट में भीगी हुई और राष्ट्रीय श्रेष्ठता बाद का जन्म हुआ यूरोपीय देश दूसरे के इलाकों को पाने के लिए आपस में गुप्त समझौते भी करने लगे इन समझौतों का असर ही भंडाफोड़ ना जाता था नहीं लेकर हर देश में भय और शंका का वातावरण भी लिखा हो जाता था ऐसे में अर्जुन कर्ण युद्ध की घड़ी और बिपाशा गई।
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