अफीम युद्ध की हार से चीनी सैन्य शक्ति की कमजोरियों के बारे में दुनिया को पता चल गया था अन्य यूरोपीय शक्तियां भी चीन में अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश करने लगी सन 1844 में चीन ने फ्रांस और अमेरिका के साथ बिना किंग की संधि की तरह ही संध्या की इन संधियों में फ्रांस एवं अमेरिका को भी चीन के शासकों से बहुत सी व्यापारिक की आयतें मिली कुछ इसी तरह की संधि दूसरे यूरोपीय देशों जैसे रूस जर्मनी इत्यादि ने भी चीन के साथ कि चीन के इलाकों में अलग-अलग देशों का प्रभाव क्षेत्र बन गए।
खुले द्वार की नीति
चीन के पूर्व में एक छोटा सा देश है जापान सन 18 सो 95 में जापान ने चीन पर आक्रमण किया जिसमें उसकी विजय हुई अब जापान ने दी चीन को उसी प्रकार की संधि करने को विवश किया जैसे बाकी है यूरोपीय देशों ने साथ हुई थी।इस तरह चीन का एक बड़ा हिस्सा अलग अलग यूरोपीय एवं एशियाई साम्राज्यवादी देशों के प्रभाव में आ गया।
संयुक्त राज्य अमेरिका लंबे समय से चीन में व्यापार कर रहा था उसे चिंता हुई कि अगर सभी यूरोपीय देशों ने चीन को अपने उन निवेशकों में बांट लिया तो अमेरिका का व्यापार बंद हो जाएगा अमेरिका ने इस तरह चीन के भिन्न-भिन्न प्रभाव क्षेत्रों में बांटने का विरोध किया और इसके स्थान पर खुले द्वार की नीति की घोषणा की।
इसका अर्थ था कि सभी देशों ने चीन में व्यापार करेंगे और किसी भी देश का कोई निश्चित प्रभाव क्षेत्र नहीं होगा थोड़ी ना नुकुर के बाद सारे देशों ने इस संधि को मान लिया।
लेकिन ऐसा क्यों हो रहा था सन अट्ठारह सौ पचास तक फ्रांस जर्मनी एवं अमेरिका ने औद्योगिकरण हो चुका था और यह देश सभी नए संभावित बाजारों पर कब्जा करना चाहते थे हमने ऊपर पड़ा है कि उस समय चीन की जनसंख्या सबसे ज्यादा थी बड़ी जनसंख्या का अर्थ बड़ा बाजार भी होता है।
इसलिए दुनिया के सारे औद्योगिक 123 चीन को अपने प्रभाव में लाना चाहते थे एक दूसरी महत्वपूर्ण वजह थी पूंजी के निवेश के लिए नए क्षेत्र तलाशना औद्योगिकरण के पश्चात हुए फायदों से यूरोप में काफी बड़ा मात्रा में पूंजी जमा हो गई थी जिससे वह उपनिवेश में रेल लाइनें बिछाने व खदान साबित करने में लगाना चाहते थे।
विदेशी नियंत्रण का विरोध हमने पढ़ा कि यूरोपीय देश जिन पर सीधा कब जाना करके अपने हित साध रहे थे जिनका शासन अभी भी चीन के ही सम्राट के हाथों में था लेकिन बहुत बड़े क्षेत्र पर उसका हुक्म नहीं चलता था ऊपर से उसे बहुत बड़ी रकम हर्जाने के रूप में देनी पड़ती थी जिसके कारण आम जनता पर कर का भार बढ़ता गया।
लगातार विदेशी शक्तियों से हो रही हार एवं अपमानजनक संधियों से चीन के लोग बदलाव की जरूरत महसूस कर रहे थे इनमें चीन के अधिकारियों का एक समूह भी था इन लोगों ने आधुनिकीकरण के लिए प्रयास किए।
उनका मानना था कि यूरोप के लोग अपनी सेना और हथियारों के कारण जीत रहे हैं तो चीन में भी आधुनिक हथियार के कारखाने स्थापित किए जाएं लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो पाए।
इन सभी घटनाक्रम ने लोगों को बहुत ही निराशा का भाव ख्याल आया क्योंकि चीन के शासक वर्ग विदेशियों के खिलाफ कुछ नहीं कर पा रहे थे इसलिए जनता सम्राट के खिलाफ हो गई सन अट्ठारह सौ पचास से सन उन्नीस सौ के बीच में कई विद्रोह हुए जिन्हें दबाने के लिए चीन सरकार ने विदेशी मदद ली।
गरीब किसानों और मजदूरों ने विदेशियों को दिए गए विशेषाधिकार के खिलाफ एक गुप्त संगठन बनाया जिसे भी बॉक्सर या मुक्केबाज के नाम से पुकारते थे उनका मानना था कि खास तरह के शारीरिक व्यायाम से बिजी हो जाएंगे और विदेशी गोलियों उनके शरीर को भेद नहीं चलेंगी।
सन 1900 मैं एक बहुराष्ट्रीय सेना ने बीजिंग पर आक्रमण करके इन विद्रोहियों को हरा दिया व्यापक लूटपाट की और लोगों को निर्दयता से मार डाला कि नहीं सकता इस पूरे मामले में मुख दर्शक बनी रही।
बॉक्सर विद्रोह की असफलता के बावजूद राष्ट्रवाद की एक मजबूत धारा का जन्म चीन में हो चुका था परिणामस्वरूप सन 1911 में मानसून शासन को खत्म करके चीन में गणतंत्र स्थापित किया गया लेकिन चीन को वास्तविक स्वतंत्रता सन 1949 में क्रांति के द्वारा ही मिली।
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